गरीबी - अनिरुद्ध कुमार 

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गरीबी मिटा दो, लगे रोज नारा,
यही एक मुद्दा, लगे आज प्यारा।
सभी बोलते हैं, गरीबी भयावह,
मिटी ना गरीबी, हुए सब किनारा।

बताते जहाँ को, गरीबी बिमारी,
सदा खेल खेले, चलाते दुधारी।
निगाहें गड़ाके, जरा देखिये ना, 
इन्हें रास आये, बड़े ये मदारी।

गरीबी सदा से, रही है रहेगी,
जमाना कहानी, कही है कहेगी।
यही आदगी को सम्हाले हुई है, 
हमेशा गरीबी हँसी है हँसेगी।

जरा देखिये ना, जहाँ का नजारा,
यहाँ रोज होता, हमारा तुम्हारा।
गरीबी लुटाये, जहाँ में उजाला,
सभी रोज लेते, इसी का सहारा।

गरीबी सरल है, नहीं ये गुमानी,
इसी के बदौलत, दिखे नेकनामी।
गरीबी अजर है, गरीबी अमर है,
यही जिंदगी है, यही जिंदगानी।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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