प्रणय = श्रीमती निहारिका झा

प्रणय = श्रीमती निहारिका झा

आत्मा को आत्मा से, 
बांधता ही तो प्रणय है।
रूप की ना इसमे तृष्णा, 
चाह काया की नहीं है,
धन की इसमे कामना ना, 
बस प्रणय की भावना है।
उम्र में ना ये है बंधता, 
बस ह्रदय में ये है बसता,
सीप में जैसे हो मोती, 
प्रेम दिल में बस है बसता।
भेद ना ये भाव  जाने,
देने का बस भाव जाने, 
कैसे कह दें प्रेम है क्या,
जन्मों का होता ये बंधन,
आत्मा को आत्मा से, 
बांधता ही तो प्रणय है।।
श्रीमती निहारिका झा, खैरागढ राज.(छ ग)

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