प्रवीण प्रभाती - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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बेबसी के जाल में इंसान फ़ँस कर छटपटाएं।
मुश्किलों को देख कर के लोग अक्सर जूझ जाएं।
साहसी ऐसी परिस्थिति में समझ से काम लेते,
जब सुखद परिणाम निकले हर्ष से तब खिलखिलाएं।
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मत जाना सूरत पर मानव, मन में क्या-क्या भरा हुआ।
ऐसे भी हैं लोग यहाँ पर, जिनका मस्तक अंध कुँआ।
तरह-तरह की कुंठा पाले, मनुज विचरता धरती पर।
मन से प्रीति उसी से होती, जिसने अंतस कभी छुआ।
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चिंता में क्यों रे अब मानव, सदा रात- दिन घुलता है।
सब कुछ छोड़ो ईश सहारे, जिसका सिक्का चलता है।
कर्म करो मन से बस प्रतिदिन, आस रखो मत प्रतिफल की,
कर्महीन मानव ही दुख से, हाथ बैठ कर मलता है।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव

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