प्रवीण प्रभाती  - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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अच्छे-अच्छे काव्य सृजन कर, लेखन धर्म निभाते हैं।
समयकाल की गाथाएँ नित, छंदबद्ध कर पाते हैं।
सामाजिक चेतना जगाते, धर्म निभाते लेखक का,
सुर साधक बन माँ शारद के, भक्ति गीत भी गाते हैं।
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तरह तरह के द्वंद्व हो रहे, इनको नित्य बढ़ाता कौन।
चेहरे विकृत इससे होते, दर्पण आज दिखाता कौन।
द्वेष अग्नि जलती हृदयों में, मन से जुड़े नहीं अब लोग,
जलती आग शमन करने को, छींटे डाल बुझाता कौन।
-  कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव

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