प्रवीण प्रभाती- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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मातु अहोइ कृपा करके निज संतति को दिन रात बचाना।
कष्ट न हो उनको इस ओर सदा अपना तुम ध्यान लगाना।
उत्तर भारत में मनता मन से ममतामय पर्व पुराना।
जो जननी उपवास करे उसको वर दे कर्तव्य निभाना।1

नित्य प्रणाम करें तुमको जननी जग की तुम मातु भवानी।
जो रखतीं तुम ध्यान तभी शुभ हों सबके दिन रात सुहानी।
आस लिये दर लोग खड़े बस माँग रहे तव एक निशानी।
भक्ति करें तिहरी जगदंब न भूल सकें पहचान पुरानी।।2
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जंगल पर्वत हैं गहने वसुधा इनसे धनवान बनेगी।
रक्षण हो इनका तब ही जलवायु धरा पर ठीक रहेगी।
काट दिये जब जंगल ही तब बारिश में अति देर लगेगी।
वृष्टि भयानक बाढ़ बने हर एक दिशा क्षति खूब करेगी।
टूट रहे हर एक दिशा अब पर्वत भी नुकसान करेंगे।
वृक्ष जड़ें जकड़ें कस के जब भूमि तभी स्थिर मेरु रहेंगे।
संपति नष्ट न हो तब ही जन के मन में अहलाद भरेंगे।
दृश्य दिखा अपने मनमोहक वे जन के संताप हरेंगे।
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा / उन्नाव, उत्तर प्रदेश
 

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