प्रवीण प्रभाती- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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पराक्रम एवं अहिंसा - 
आप दयालु अहिंसक हो यह भाव सदा सबके मन आता।
लेकिन शत्रु खड़ा सम्मुख तो इसको तजना अति भाता।
कौन स्वरूप स्वभाव प्रदर्शित हो पहले मन मे यह सोचें।
भाँप परिस्थिति निर्णय लें यह तथ्य पुरातन नित्य सुहाता।
लोग सलाम करें उनको नित शौर्य पराक्रम जो दिखलाते।
वक्त पड़े तब शूर तजें बल धैर्य धरें सब काम बनाते।
संयम शील स्वभाव कर्मठ उत्तम कर्म करेंगे।
त्याग सके अति जीवन से तब लोग सभी उनके गुण गाते।
मन बसी मृगतृष्णा - 
जंगल-जंगल ढूंढ रहा मृग, बसी नाभि कस्तूरी को।
पर मुश्किल है तय कर पाना, खुद से खुद की दूरी को।
इस दुनिया के मोहजाल में, खुद को क्यों उलझाते हो।
भ्रमवश नहीं दिखाई देता, मन को क्यों भटकाते हो।
कस्तूरी खोजन की खातिर, फिरता क्यों मारा मारा।
मृगतृष्णा सा मोह त्याग कर, उर अंतर छानो सारा।
नहीं पड़ेगा व्यर्थ भागना , जब खुद को पहचानोगे।
कस्तूरी की नहीं चाहना, जब अपने को जानोगे।
-  कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव, उत्तर प्रदेश

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