प्रवीण प्रभाती - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

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पर्यावरण रक्षा  :-
लोलुपता की अंध दौड़ में, तोड़ दिये हैं बंधन सारे।
नष्ट किया नैसर्गिक शोभा, रूठे-रूठे चाँद-सितारे।
पर्यावरण सहेजें वरना, फिर हम सब ही पछतायेंगे,
खो जाएंगे वृक्ष-नदी-खग, खो जाएंगे चांद-सितारे।
रिश्ते  :- 
रिश्तों का अहसास, कराते कुछ बंधन।
उपजे नव विश्वास, जहाँ हो यह बंधन।
यह जुड़ाव अनमोल, सँभाले इनको हम।
इनमें मोल न तोल, बड़े सुखमय बंधन।।1
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चलो सँवारें आज, बनाये जो रिश्ते।
बने न इन बिन काज, बड़े नाजुक रिश्ते।
मिलकर करें प्रयास, निभायें जीवन भर।
बंधन इनका खास, परम पावन रिश्ते।।2
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव, उत्तर प्रदेश 

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