प्रवीण प्रभाती - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी

pic

"बाल श्रम"

दर-दर ठोकर खाता बचपन, शर्म न हमको आती।
बिना तरस खाये बच्चों से, दुनिया नज़र फिराती।

जिन हाथों में बस्ता होता, यंत्र पकड़ते प्रतिदिन,
उनके लाये दो पैसों से, रोटी घर बन पाती।

जब भी गुदड़ी में ये सोते, स्वप्न सुहाने देखें,
दिन बहुरेंगे कभी सींच कर, नींद इन्हें आ जाती।

हम सरमाया इनके बनकर, हाल क्यों नहीं बदलें,
हाथ थाम ले जो भी इनका, दुनिया भी गुण गाती।

"रिश्तों का मूल्य"
बना घुमंतू जीवन जिनका, उन आँखों में सपने हैं।
जिन राहों पर आगे बढ़ना, उन पर अक्षर लिखने हैं।1
पथराई आंखों से देखे, कोई वापस अब आये,
निपट अकेले छोड़ा है जब, कहने को सब अपने हैं।2
पहले कुनबा रेवड़ जैसा, साथ साथ सब चलते थे,
नई डगर पर चले गये ज्यों, नये दृश्य कुछ रचने है।3
एक आस फिर भी है मन में, कोई तो वापस आये,
चहल पहल होगी हर कोने, घर आँगन फिर सजने हैं।4
एक सीख लेनी हम सबको, सारे इससे गुजरेंगे,
रिश्तों को भरपूर जियें सब, बचे हुए दिन जितने हैं।5
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव,उत्तर प्रदेश 
 

Share this story