राधा मन की रानी  रही हैं = किरण मिश्रा

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वो बहता सा पानी रही है,
नाम जो ज़िंदगानी रही है!

दूर होकर भी श्याम से,
राधा ही मन की रानी रही है! 

जुर्म सहती रही उम्र भर
कृष्ण मीरा दीवानी रही है! 

लूटकर ले गये  ख्वाब हर, 
दर्द ही बस निशानी रही है! 

लाख शाखों से पत्ते झड़े, 
प्रेम ऋतु जाफ़रानी रही है! 

लफ्ज़ लफ़्ज सज़ गये वो, 
कलम जिनकी कहानी रही है! 

शरारत नजरों की ही तेरे, 
मेरी हुश्नो-ज़वानी रही है!

दर्द, आँसू, बेचैनी ,बेकसी,
इश्क़ सदियों कहानी रही है! 

जा रहे छोड़ चाहत किरण
खूब उनकी बदगुमानी रही है! 
= किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा" , नोयडा
 

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