रक्षा बंधन – (बहन की  चिट्ठी) - जसवीर सिंह हलधर

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भैया तुम सरहद पर रहकर तम दूर करो ।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।

लगता है दुनियाँ में ईमान खो गया है ।
फूलों का रंगीला परिधान खो गया है ।
तुम सीमा पर संगीनों से इतिहास लिखो ,
मैं घर पर रह घर का भूगोल सजाऊंगी ।।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।1

बढ़ रही वेबसी गांव गली चौवारों में ।
पशुता नंगी हो नाच रही बाजारों में ।
मैं गाकर दीपक राग जगा दूंगी मुर्दे ,
खुद के सक्षम होने का अर्थ बताऊंगी ।।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।2

रो रही सभयता साहित्यक रथ रुका हुआ ।
हो रहे कृत्य विध्वंस सृजन है थका हुआ ।
लूट रही द्रोपदी नग्न खड़ी चौराहों पर ,
मैं माधव बन कर उसकी लाज बचाऊंगी ।।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।3

कुछ रोग लगा भारत उपवन की काया में ।
दुख नाच रहा रोगी कलियों की छाया में ।
तुम तोपों के संग सावन घन जैसे वर्षों ,
मैं भी तलवारों से मल्हार गवाऊंगी ।।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।4

अब स्वयं उतरना होगा अपनी रक्षा में ।
दानव घुस कर बैठे सामाजिक कक्षा में ।
तट पर रहकर उपचार असंभव है "हलधर",
लहरों से टकराकर ही नाव चलाऊंगी ।।
मैं खुद की रक्षा का व्रत आज उठाउंगी ।।5
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून
 

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