सखि फागुन है = किरण मिश्रा 

सखि फागुन है = किरण मिश्रा

जब नैनन नेह लगे रिसने,
तब जानि लियो,सखि ! फागुन है।
जब हूक लगे हिय में उठने,
तब जानि लियो, सखि! फागुन है।
जब अंग अनंग लगे डसने ,
तब जानि लियो,सखि! फागुन है। 
जब मौन मृदंग लगे बजने, 
तब जानि लियो सखि! फागुन है।

अमवा पर कोयल गाय रही, 
तब मानि ...लियो, सखि ! फागुन है ।
पियरी सरसों लहराय रही,
तब मानि लियो सखि! फागुन है।
जब किंशुक लाल पलाश खिले,
तब मानि लियो सखि! फागुन है ।
अमिया गम के गदराय रही,
तब मानि लियो सखि ! फागुन है। 

पुरवा मन को बहकाय रही ,
तब मानि लियो सखि ! फागुन है।
बगिया कलियाँ महकाय रही, 
तब मानि लियो सखि! फागुन है।
मुख साजन लाल गुलाल सजे,
तब मानि लियो सखि! फागुन है।
घर आँगन फागन राग बजे ,
तब मान लियो सखि! फागुन है ।।
= किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा", नोएडा
 

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