सीमा - जया भराड़े बड़ोदकर 

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हर एक की,
एक सीमा होती हैं,
चाहे वो कुछ भी हो,
सेल फोन है आज
सीमा पार जा चुका है,
समय समय पर ये
बच्चों में सीमा पार जा चुका है,
बड़े-बूढ़े भी इसके
आगोश मे समा चुके हैं,
ये तो जैसे सबके
जीवन में अनिवार्य बन चुका है,
क्या वक्त आ गया है ?
क्या ये सब जरुरी है ?
सब कोई , सब कुछ भूल चुका है। 
न ही किसी को किसी की
अब जरूरत है,
ना ही किसी को किसी की
याद दिलाता है। 
सजीवता खो चुकी है,
कृत्रिमता आ बसी है। 
सुबह हो या शाम हो,
सक्रिय जीवन अब
निष्क्रियता के बोझ मे दब चुका है। 
खाली हो गए रिश्ते सारे,
स्क्रीन मे सिमट गए हैं,
अब रात की चांदनी भी
स्तब्ध सी हो गई है,
हाथ, आँखे, मन का,
अब काम इतना रह गया। 
बाकी सब तो जीवन मे,
कुछ भी शेष नही रह गया। 
निरर्थक  जीवन के,
प्राण का रंगीन वक्त,
बदरंग हो गया। 
बचा लो अपने वक्त को,
संभालो अपने जीवन को,
छोड़ के बेजुबाँन वक्त के,
इशारों को समझ लो,
पछताना पड़ सकता है अंत में। 
समय रहते सुधार लो स्वयं को,
ले लो सुध-बुध अपने तन-मन की। 
अकेलेपन के जहर से,
तुम बच जाओगे
सुनहरा वक्त हाथ से,
छुट जायेगा,
दुःख में हाथ मलते,
रह जाओगे। 
समय रहते ही अपने जीवन को,
अपनेपन के पारस से शुद्ध सोना,
तुम बना लो। 
- जया भराडे बडोदकर,
कमोथे, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

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