सियावर राम बसते हैं  = पुष्पा प्रियदर्शिनी

सियावर राम बसते हैं = पुष्पा प्रियदर्शिनी

मिले न द्वार जब कोई वो रघुवर द्वार आते हैं।
वो घर मंदिर लगे जिसमें सियावर राम  बसते हैं।

बसे जब राम मन में तो सुहाता नाम न कोई।
लगाकर ध्यान चरणों का,जगा मन द्वार ये सोई।

कृपा जो तेरी हो जाए तो संकट नित्य हरते हैं।
वो घर मंदिर लगे जिसमें सियावर राम बसते हैं।

जनम तुमने जिस दिन कौशल्या मात हरषाई।
हुआ तब धन्य वो आँचल  तुम्हें जब अंक में पाई।

दया जब तेरी हो जाए ,जगत का ताप हरते हैं।
वो घर मंदिर लगे  जिसमें सियावर राम बसते हैं ।

जनक प्रण टूट न जाए, प्राणप्रिय शिवधनुष तोड़े।
सभा की मान गरिमा रख  सिया संग नाते थे जोड़ें।

नियति के आगे जगकर्ता खुशी से सिर झुकाते हैं।
वो घर मंदिर लगे जिसमें, सियावर राम बसते हैं।

मही संकट  में  है भारी, देखो मेरे रघुराई।
क्षमा का दान देकर फिर,  उबारो मेरे प्रभुराई।

मनुष अवतार लेकर फिर, स्वयं भगवान आते हैं।
वो घर मंदिर लगे जिसमें , सियावर राम बसते हैं।

= पुष्पा प्रियदर्शिनी पुष्पा, धनबाद, झारखंड
 

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