गीत = अनिरुद्ध कुमार

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धानी चुनरी नित लहराये, नैंन निहारे दंग।
हरियाली मन को हर्षाये, प्रीत जगे हर अंग।।
टेसू टेसू बांह पसारे,
रंगबिरंगे फूल निहारे,
सुर में कोई करे इशारे,
मन इतराये देख नजारे।
भोर पहर नभ लाली छाये, झूमता मन मलंग।
हरियाली मन को हर्षाये, प्रीत जगे हर अंग।।
भोर ओस की बूंद लुटाये,
जड़ चेतन मादकता छाये,
पवन हिलोरे मन मुस्काये,
जीवन आशा जोर लगाये।
दूर कोई बंसी बजाये, रह रह उठे तरंग।
हरियाली मन को हर्षाये, प्रीत जगे हर अंग।।
सुंदर सपने राह सजाये,
राही पथ पर चलता जाये,
जागे सोये आस लगाये,
कैसे कैसे खेल दिखाये।
नैंन पुतलियां नित भरमाये, जीने का यह ढंग।
हरियाली मन को हर्षाये, प्रीत जगे हर अंग।।
इक ऋतु आये, दूजा जाये,
अपना सुर संगीत सुनाये,
मौसम मौसम रूप बनाये,
आनंदित तरुणी बलखाये।
काले बादल नभ मडराये, विचरें हिया उमंग।
हरियाली मन को हर्षाये, प्रीत जगे हर अंग।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड।

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