गीत = अनिरुद्ध कुमार

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घड़ियाली आँसू दिखलाते, दुनिया के सब लोग।
बलिवेदी पर बेटी चढ़ती, तिलक बन गया रोग।।
          रोज हीं बकझक, खरीखोटी, 
          रो कर  बोल रही अब छोटी।
          बेटा का  क्यों  पलरा  भारी,
          कब तक  बली  चढ़ेगी  बेटी।
नारी पर क्यों दाव लगाते, लगा लगा अभियोग।
बलिवेदी पर बेटी चढ़ती, तिलक बन गया रोग।।
           बेटा बेटी समझ बराबर,
           बेटी बोले, कहते चुपकर। 
           समाजिक परिवेश ये कैसा,
           कितना सहे बेटियाँ घुटकर।
जागो हे समाज के रसिया, क्यों करते हठयोग।
बलिवेदी पर बेटी चढ़ती, तिलक बन गया रोग।
            बेटियों को बहू है बनना,
            घर आंगन की हैं ये गहना।
            भेद नहीं कोई दोनों में,
            बेटी-बहू मानती कहना।
भाग्यशाली जो ये सुख पाये, मान इसे संयोग।
बलिवेदी पर बेटी चढ़ती, तिलक बन गया रोग।।
             शादी ब्याह प्रेम गठबंधन,
             शुभ कार्य में ना हो क्रंदन।
             बहुयें हीं परिवार चलाती,
             बहुओं का हो हरपल वंदन।
लेनदेन का लफड़ा छोड़ो, लाओ बहू निरोग।
बलिवेदी पर बेटी चढ़ती, तिलक बन गया रोग।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह,  धनबाद, झारखंड

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