गीत = अनिरुद्ध कुमार

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बचपन, यौवन और बुढ़ापा, जीवन पानी पानी।
रोले, गाले,  हँसले जीभर, सबकी एक कहानी।।
         आँख खुली तो माँ को पाया,
         ममता आँचल सर का साया।
         मृदुल प्रेम का पा आलिंगन,
         आनंदित बचपन इतराया।
खुशी लुटाये दादा दादी, नाती कहती नानी।
रोले, गाले, हँसले जीभर, सबकी एक कहानी।।
         ताता थैया यौवन कलकल,
         बापू कहते बेटा ही बल।
         शिक्षित कर इंसान बनाया,
         भाव तरलता नैंनो में जल।
सपनों को साकार सजाया, देकर के कुर्बानी।
रोले,गाले, हँसले जीभर, सबकी एक कहानी।।
         जीवन को संग्राम बताया,
         जो लड़ता उसने हीं पाया।
         विचलित ना होना ये राही,
         कर्मशील कुंदन कहलाया।
सबकी चाहत एक सहारा, जीवन साथी रानी।
रोले,गाले, हँसले जीभर, सबकी एक कहानी।।
          आते साठ बुढ़ापा छाये,
          धनदौलत बेकाम होजाये।
          बीमारी का चलता रेला,
          राम रटन हीं मन को भाये।
बैठे सोये मनवा तौले,  गुण, अवगुण, नादानी।
रोले,गाले, हँसले जीभर, सबकी एक कहानी।।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड

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