गीत - अनुराधा पाण्डेय 

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जाओ ! कट्टी ,सच्ची-मुच्ची ,
तुमसे प्यार नहीं करती हूँ....
बहुत सताते आँख दिखाते,
मुझको सपनों में भरमाते। 
रहते हो तुम दूर विजन में,
मुझ पर बस अधिकार जमाते ।
मैं ही फिर क्यों आऊँ वन में...
सीमा पार नहीं करती हूँ। 
जाओ ! कट्टी ,सच्ची-मुच्ची,
तुमसे प्यार नहीं करती हूँ...
तुम अंबुधि तो मैं भी सरिता,
मेरी भी है मर्यादाएँ । 
मेरे ही मृदु जल से निर्मित 
रत्नाकर की भी समिधाएँ। 
बाध्य नहीं हूँ तुम तक आऊँ,
मैं स्वीकार नहीं करती हूँ। 
जाओ ! कट्टी,सच्ची-मुच्ची,
तुमसे प्यार नहीं करती हूँ। 
प्रणय भला होता क्या विपणन,
मैं बोलूं तब ही तुम बोलो ।
आवश्यक क्या मृदुल भाव को ,
मापो या पलड़े में तोलो। 
"मैं","तुम" दो की तुलना का मैं----
छल व्यापार नहीं करती हूँ। 
जाओ! कट्टी,सच्ची-मुच्ची,
तुमसे प्यार नहीं करती हूँ...
- अनुराधा पाण्डेय , द्वारिका दिल्ली

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