गीत---डॉ० अशोक ''गुलशन''

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मैं गगन का मुक्त पंछी तुमसे अपना कौन नाता ,
आज हूँ इस छोर कल जाने कहाँ मैं जाऊँगा|

शब्द-स्वर में बस तुम्हारी ही सदा आवृत्ति है,
आह में मुस्कान में भी प्यार की अभिव्यक्ति है|
है भटकना कर्म अपना लक्ष्य पथ की चाह में,
कह नही सकता कि कब गन्तव्य अपना पाऊँगा ||

रूप में है छवि तुम्हारी दृश्य में दर्शन तुम्हारा ,
कर सका जो बन गया है मनुज बन सबका सहारा|
रख सको तो याद रख लेना हृदय में तुम संजोकर ,
हो सका तो फिर दुबारा जन्म लेकर आऊँगा||

है निरर्थक अर्थ अपना जिस तरह अव्यक्त सपना,
ज्यों चिता से दूर होकर चिन्तनों में नित्य तपना|
जन्म से जिस तरह कोई मृत्यु का सुख चाहता हो,
उस तरह मैं भी हृदय में प्यास लेकर आऊँगा||
----डॉ० अशोक ''गुलशन'', उत्तरी कानूनगोपुरा, बहराइच उ0प्र0
 

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