गीत  = जसवीर सिंह हलधर 

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बेसक ढेर लगाया धन का ,यहीं छोड़कर जाना होगा ।
कर्मों  के  ताने  बाने  को , यहीं तोड़कर जाना होगा ।।

लोभ मोह आपाधापी में, छूट गए सब काम जरूरी ।
साधन के हम दास बने हैं , हुई साधना कभी न पूरी ।
रहा घूमता मिथ्य शिविर में ,पैर पटकता रहा तिमिर में ,
आसमान को छूने वाली , चाह  हमेशा  रही  अधूरी ।।

जिस दिन प्राण साथ छोड़ेंगे ,व्योम प्रस्थ को रुख मोड़ेंगे ,
गाड़ी  घोड़ा  छोड़  यहीं  पर , तेज दौड़कर जाना होगा ।।1

जिसे मानते है हम अपना ,प्राण देह का भार ढो रहा ।
जीवन रूपी सजी पालकी ,अंतस में तो काल सो रहा ।
मानस की हैं दोनों भगिनी ,माया मौत नाम की ठगिनी ,
अनजाने में मन बंजारा ,क्यों जी को जंजाल बो रहा ।।

कविता जिंदा बची रहेगी ,बचे रहेंगे छंद सारथी ,
जीवन रूपी इस वीणा के ,तार जोड़कर जाना होगा ।।2

लक्ष्य भेदने को क्या आये ,आज कौन से पथ के राही ।
सीधी सच्ची राह छोड़कर , करते आये हम  मनचाही ।
कितने भी हम करें बहाने ,अंत समय वो काम न आने ,
पेशी जिस दिन ऊपर होगी ,तब कर्मों की लगे गवाही ।।

खाता सबका वहीं खुलेगा , सत्य झूठ के साथ तुलेगा ,
गरल भरा गागर में जितना ,यहीं फोड़कर जाना होगा ।।3

वृक्ष भांति यह जीवन होवे ,धरती का जो बने आवरण ।
ताजी हवा सदा देता वो ,करता है क्या कभी विष क्षरण ।
प्यार सिंधु से नहीं तोड़तीं , अपना रस्ता नहीं छोड़तीं,
नदियों जैसी रखें जिंदगी ,कायम रखतीं उच्च आचरण ।।

दुखियों के संग आह करें हम ,दुनियां की परवाह करें हम ,
गुणा भाग छोड़ो "हलधर"अब राह मोड़कर जाना होगा ।।4
=  जसवीर सिंह हलधर , देहरादून 
 

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