गीत - जसवीर सिंह हलधर 

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मैंने एक फूल मांगा था उसने तो गुलदान दे दिया ।
दोहे का वर मांग रहा था पूरा छंद विधान दे दिया ।।

मलयानिल सा सोया था मैं सपनों के गहरे सागर में ।
लेकिन अब अहसास हुआ है सिंधु भरा उसने गागर में ।
अर्पित कर दी पूजा थाली मैं वो बड़भागी वन माली ,
लोक गीत गाने वाले को कविता का वरदान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था उसने तो गुलदान दे दिया ।।1

वो अंनत करुणा का सागर मैं गंवार मूढ़ अभिमानी ।
भू मण्डल के ओर छोर पर उससे बड़ा कौन है दानी ।
मेरी अभिलाषा थी छोटी  उसकी परिभाषाएं मोटी ,
शब्दों की छोटी मूरत को छंदों का पाषाण दे दिया ।
मैंने  एक फूल मांगा था उसने तो गुलदान दे दिया ।।2

मैं था एक अनाड़ी मानस कविता राह दिखाई उसने ।
मेरे इस नीरस जीवन में रस की चाह जगाई उसने ।
सारे जग का दर्पण उसमें सारे जग का तर्पण उसमें ,
एक गाँव की मांग रखी थी पूरा हिंदुस्तान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था उसने तो गुलदान दे दिया ।।3

यदि वो चाहे तो फूलों की शैया पर भी मानस रोये ।
वो चाहे तो कांटों पर भी लंबी गहरी नींद सँजोये ।
जब वो चाहे भाग्य जगा दे पानी में भी आग लगा दे ,
हलधर" जैसे देहाती को साहित्यिक सम्मान दे दिया ।
मैंने एक फूल मांगा था उसने तो गुलदान दे दिया ।।4
- जसवीर सिंह हलधर , देहरादून (उत्तराखंड)
 

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