झुग्गी झोपड़पट्टी में रहने बाली महिलाओं का दर्द (आलेख) -  झरना माथुर 

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Utkarshexpress.com, Dehradun - आज शाम अचानक से मन हुआ कि मौसम बहुत सुहाना है। क्यूँ ना कही टहल आये। मै जल्दी से तैयार  होकर निकल पड़ी। अचानक कुछ दूर जाने पे मुझे कुछ बस्ती सी दिखाई दी। वो झोंपड़ बस्ती थी। वहां  कुछ मजदूर  रह रहे थे। तभी देखा एक बच्चा बुरी तरह से रो रहा था। मुझसे रहा नही गया और मेरे पैर उस तरफ चल पड़े। जैसे ही मै वहाँ  पहुची।
       मैंने देखा कुछ बच्चे और महिलायें बहार आ गयी और अचरज भरी निगाहों से मुझें देखने लगी। मैने उन्हें अपना परिचय दिया तो एक महिला कुछ समझदार सी दिखी। वो जल्दी से एक टूटा स्टूल मेरे बैठने के लिये ले आई। मै भी बैठ गयी वहां और उन लोगो से बच्चे के रोने के का कारण पूछा। वहां पर उस बच्चे की माँ भी आ गई। उसके कुछ शरीर पे चोट के निशान थे। मैने पूछा क्या हुआ तुम्हें। एक दम से रोने लगी।
      तभी दूसरी औरत ने उसके बारे में बताया कि  इस बच्चे को बुखार है और उसकी माँ  दिन भर मजदूरी करती है। चार बच्चों का पेट पालती है। इसका पति जो कमाता है वो शराब में उड़ा देता है। नशे में अपनी पत्नी और बच्चों को मारता पीटता है।
         ऐसा सिर्फ उसके साथ ही नही था। वहां पर और महिलाओं के साथ भी ऐसा होता था। तभी एक बुजुर्ग महिला बोली अर्रे घर- परिवार में तो ऐसा होता ही है। हमारे साथ भी ऐसा ही होता था, वहाँ खड़ी और महिलाओं ने भी उस बुजुर्ग महिला की हा में हा मिलाई।
        मै कुछ देर वहां बैठने के बाद घर वापस आने लगी। लेकिन मेरे दिमाग में सारी बातें घूमती रही।  क्या हम महिलाओं का जीवन ऐसा ही है। हम पुरुष, समाज, परिवार और पति के हाथो की सिर्फ कठपुतलियां है। जैसा वो चाहे हमे वैसा ही जीवन जीना पढता है। हमारी क्या इच्छा है या हम क्या चाहते है। इससे किसी को कोई मतलब नही।
        कही-कही हम महिलाये मायके और ससुराल के बीच में अपने को पीसा हुआ पाते है। ना चाहते हुए भी अपनी इच्छाओ का दमन करते है। बस यही सोच के अपने को समझाते है कि यही हमारे भाग्य में लिखा था। यही हमारा जीवन है। फिर अपने पति, बच्चों और परिवार के लिये पूजा- पाठ करते है। कभी बहुत दिल भर जाता है तो अपने आचल से आसूँ पोछ लेते है। फिर मुस्कुरा के काम मे लग जाते है।  प्रचीन काल से आधुनिक काल तक औरत का जीवन सिर्फ पुरुषो के भोग विलास के लिये ही रहा है और हम औरतो को भी अब इसी में जीने की आदत पड़ चुकी है। बहुत कम महिलाये ऐसी है जो अपनी आवाज उठा पाती है या हिम्मत करके अपना जीवन जीने का प्रयास कर पाती है। 
- झरना माथुर, देहरादून (उत्तराखंड)

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