जीवन की सच्चाई - कर्नल प्रवीण त्रिपाठी (आधार छन्द- विष्णुपद छंद)

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मन उद्विग्न सदा रहता है, कुंठा पलने से।
जीवन हो जाता है सुखमय, शुभ पथ चलने से।1

ऊर्जित लगता दिवस हमेशा, नभ में जब रवि हों,
आभा कम होती है दिन की, दिनकर ढलने से।2

संकट में जब घिरे मनुज तब, वह विचलित रहता,
चैन हृदय पाता है केवल, विपदा टलने से।3

कठिन समय पर साहस से ही, काम सदा लेना,
बतलाओ क्या लाभ मिलेगा, दु:ख में गलने से।4

मानव मन में स्वार्थ भरे जब, शांत नहीं रहता,
हानि अंत में खुद को होती, जग को छलने से।5

औरों की मत मिटा लकीरें, काम युक्ति से ले,
अपनी रेखा स्वयं बढ़ाना, बढ़िया जलने से।6

उचित समय निर्णय ले लें, चिड़िया नहीं उड़े,
वरना क्या होगा हाथों को, खाली मलने से।7
- कर्नल प्रवीण त्रिपाठी, नोएडा/उन्नाव (उत्तर प्रदेश) 

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