ये दुनिया = अनुराधा सिंह'अनु'

ये दुनिया = अनुराधा सिंह'अनु'

गुजर रही है अजब दौर से अभी दुनिया,
के जिसमें जीना भी मुश्किल है, हां वही दुनिया।

न जाने कब कहां सांसों के डोर कट जाए,
खुद अपनी सांसों से लगती डरी-डरी दुनिया।

खरीदी जाने लगी है हवा भी धड़कन की,
उधार सांसों के आगे है अब झुकी दुनिया।

दवाएं बेचने वाले बनें हैं पत्थर दिल,
कहीं बची है क्या इंसानियत की भी दुनिया।

तरसती रूहों का सुख - चैन लूटेगी कब तक,
इस इम्तेहां से उभर पाएगी कभी दुनिया।

खनकते लाशों के बाजार में है क्यों सिक्के?
अजीब मौकापरस्तों से है भरी दुनिया ।

सताए औरों को न खुद से धोखा ही खाएं,
क्या ऐसे लोगों से खाली हुई भरी दुनिया।

जो मरना सीख लें, जीने का हक़ उसी को है,
उसी के कंधों पे अब तक है यह टिकी दुनिया।

निराश मैं तो 'अनुराधा' हो नहीं सकती,
मैं मुंतज़िर हूं के होगी हरी-भरी दुनिया।

= अनुराधा सिंह"अनु" राँची, झारखण्ड
 

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