वक़्त गुजरता रहता है, यादें मृत्युपर्यन्त रहती है = विनोद निराश 

वक़्त गुजरता रहता है, यादें मृत्युपर्यन्त रहती है = विनोद निराश

वक़्त मुसलसल गुजरता रहता है, मगर यादें मृत्युपर्यन्त जिन्दा रहती है, वो कभी चिरनिंद्रा में विलीन नहीं होती। हाँ मन की पीड़ाएँ समयानुसार ज्वार-भाटे की तरह परिवर्तनशील होती रहती है। मगर वो अशेष स्मृतियाँ सदैव शेष रहती है। आज दु:खी मन कई बार दर्द की पराकाष्ठा से गुजर बेबस सा होकर रह गया। इस बेबसी के आलम में कोई कर भी क्या सकता है। 
आज एक माह हो गया उस क्रूर दिवस को जिसे याद कर आज भी क्रंदन की पराकाष्ठा तड़ित की भांति नृत्य करती नज़र आती है। 3 अप्रैल 2021 रात्रि लगभग 11:20 बजे हम दोनों एक दूसरे से बिछुड़ गए थे। लगभग 2 सप्ताह तुमने जो कष्टकारी पीड़ा अपने शरीर पर झेली है, जिससे मैं पल-पल रू-ब-रू हुआ हूँ। उन ह्रदय विदारक लम्हो की व्याख्या को शब्दों से बयां नहीं की जा सकती है। कई बार वो मुझसे, मैं उससे लिपट कर खूब रोये। मैं आज तक वो पल भी नहीं भूला पाया हूँ, जब तुम बार-बार मुझसे कुछ कहना चाहती थी. तुम्हारी बातें सुनने के लिए मैं अपने कानो को तुम्हारे होंठों तक सटा देता था, मगर एक भी शब्द तुम्हारे कंठ की दहलीज़ नहीं लाँघ पाता था। तुम बड़ी बेचैन प्रतीत होती थी अपनी बात कहने के लिए, अपने संवाद मुझ तक पहुंचाने के लिए। आज भी मन वो दृश्य सोचकर व्याकुल हो उठता कि जाने तुम क्या कहना चाहती थी। तुम्हारे न बोल पाने की विवशता, मेरे न सुन पाने जिज्ञासा में बहुत कशमकश रहती थी, जो आज भी ह्रदय में शूल की भांति चुभती है। मगर मैं कर भी क्या सकता था, विधि के विधान और नियति के सामने। 
अंतिम दिनों में दून अस्पताल देहरादून में जब उसने अस्पष्ट आवाज़ में मेरे कान में कहा कि मेरा समय आ गया है, आप मुझे झूठी दिलासा क्यूँ दें रहे हो। ये सुनते ही मानो मेरे पैरों के नीचे से जमीं खिसक गई हो। मैंने उसका सर अपने काँधे से लगा लिया, मेरे नेत्र सजल हो गए। आंखों के सामने सारे मंज़र धुंधले से नज़र आने लगे। मेरे हाथ पसीजने लगे, मैं अवाक सा निरुत्तर हो गया। मेरी सम्वेदनाए शून्य में विलीन हो गई। मैं जानता था कि उसका परलोक गमन निर्धारित है, मगर जाने कैसे उसे ये अनुभूति हो गई कि हम दोनों का साथ क्षणिक है। अन्ततः उसका लोक गमन हो गया। विलीन हो गये सारे स्वप्न मेरे भी उसके साथ ही। और वेदनाएं सहने को शेष रह गया सिर्फ और सिर्फ मैं। ये सच है कि देवलोक गमन पुण्य आत्माओं के लिए सुखद अनुभूति है, मगर उनके पीछे छूट गये शोक संतप्त परिजनों के लिए ये वेदना अशेष असहनीय होती है। मैंने भी एक माह तक उसी कमरे को अपनी ख्वाबगाह बना कर रखा, जहाँ अंतिम क्षणों में ताबूत के अंदर तुम चिरनिंद्रावस्था में विलीन थी।

 

एक तो असमय तुम्हारा साथ छोड़कर चले जाना, साथ ही मेरे जीवन में कोरोना जैसी भयावह व्याधि का आगमन किसी सदमे से कम न था। हमेशा अपने दोनो बच्चो की चिन्ता दिन-ब-दिन सताती जा रही थी, कि यदि मुझे कुछ हुआ तो इनका क्या होगा। मात्र 4 जनो का परिवार था। मैं, पत्नी, बेटा, बेटी। हमेशा दिल को एक भय सताता रहता कि 4 के 3 हो गए, कहीं 3 के 2 न हो जाए, ये सोचकर आँखे तो कई बार अश्कबार हुई, मगर विषम परिस्थितयों में भी मेरे बेटे  उत्कर्ष ने मुझे धैर्य नहीं खोने दिया। जिस बेटे के नाम मात्र में ही सकारात्मकता परिलक्षित है तो परिणति भी सकारात्मक ही होगी । यही वजह है कि बच्चो के असीम स्नेह और दिन-रात की देख-रेख ने कोरोना पीड़ित होते हुए भी मेरे अंदर सकारात्मक ऊर्ज़ा की असीम प्रचुरता भर दी। जिसके परिणाम स्वरुप आज 17 दिन बाद मैं लगभग पूर्ण स्वस्थ महसूस कर रहा हूँ। साथ ही आज पत्नी के परलोक गमन को भी एक माह पूरा हो गया। अब अतीत को भूलाकर अपने दोनों बच्चो के साथ एक नये जीवन के लिए धीरे-धीरे खुद को तैयार कर रहा हूँ। हालाँकि सांसारिक स्मृतियों बड़ी पीड़ादायक होती है, इतनी जल्दी पीछा नहीं छोड़ती है। वो निराश मन को सदियों तक अनवरत उद्वेलित करती रहेंगी, मगर सुना है कि वक़्त का मरहम दिल के हर जख्म को भर देता है, इसी सोच के साथ जीवन पथ पर अनवरत बढ़ने की अभिलाषा संजोये हूँ। 
= विनोद निराश, देहरादून (सोमवार 03/05/2021) 
 

Share this story