विराज (संस्मरण) - नरिंदर कौर 

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जैसा कि आप सब जानते हैं कि कोरोना महामारी में कितने ही लोग अपनों से कितने ही महीनों तक अलग रहे है परंतु माहौल ही ऐसा था कि इस स्थिति में लोग असहाय सा महसूस कर रहे थे । यह लॉकडाउन और चारों तरफ फैलती बीमारी का डर और इसी डर के साये में अपने लोगों को खोने का डर और रही सही कमी मीडिया वाले न्यूज चैनल इत्यादि पूरी कर रहे थे । और इन सभी परिस्थितियों में सबसे बुरा हाल था विदेश में रहने वाले अनगिनत भारतीयों का था । इन्हीं विदेशियों में थी मेरी प्यारी नन्द जो कि सिंगापुर में रहती थी और गर्भवती भी थी पहले तो यही सोचा था कि माँ या सास कोई भी बच्चे डिलिवरी के समय वहां जाएंगी । परन्तु यही लॉकडाउन और फ्लाईट के बंद होने के कारण वह जुलाई में किसी तरह इंडिया आ गई । यहाँ के अच्छे नर्सिंग होम में उसकी डिलीवरी के लिए रजिस्ट्रेशन करा दिया गया । पर जितनी मर्जी जान पहचान लगा लो , हर समय पर कोरोना का टेस्ट करवाना अनिवार्य था । चलो जैसे तैसे उस डर के माहौल में भी वो खुशी का दिन आ ही गया , 9 सितंबर 2020 जब उसने प्यारे से बेटे ( जिसका नाम विराज ) को जन्म दिया । बच्चा दिल्ली में हुआ , उसके पापा सिंगापुर में , दादा दादी पुणे में और बच्चे की इकलौती बुआ मुम्बई में थे । इतना ख़ुशी का वह लम्हा पर  परिवार का कोई भी सदस्य उस बच्चे से मिल नहीं सकता था। विडियो काल पर  बच्चे की एक झलक देखी ।  परन्तु विराज के होने की खुशी के अभी कुछ ही लम्हे बीते थे कि डॉक्टर ने बताया कि बच्चे को साँस लेने में दिक्कत हो रही है , और उसको अस्पताल में रखना पड़ेगा । एक तो मेरी नन्द अकेली यहाँ न उसका पति , न सास , न ससुर , वो करे तो क्या करे । उस समय ना जाने भगवान ने कहाँ से हिम्मत दी कि खुद से उन्होंने ज़िम्मेवारी उठाई है तो उसे पूरा तो करना ही पड़ेगा । तो मैंने और सब घरवाले (उसके मायके वाले ने मिलकर बच्चे को बडे अस्पताल में भर्ती करवाया । समय-समय पर उसके पापा से बात भी करते रहे । वो 10 दिन का मुश्किल वक्त किस तरह निकला , वो सोच कर आज भी सिहरन सी होती है । फिर हम उस प्यारे से नन्हें विराज को उसकी नानी के घर लेके पहुँचे। इसी दौरान उसके पापा भी भारत आने की कोशिश कर रहे थे, परन्तु नही आ पाए । सिंगापुर सरकार की शर्त थी कि एक बार भारत गए तो वापस नहीं आ सकते । उस डिलीवरी के साथ- साथ 10 दिन का समय विराज के अस्पताल का भी अच्छा खासा बिल बना रहे थे । ऐसे में वहाँ का काम भी नहीं छोड़ सकते थे । चलो ये तो थी विराज के जन्म की कहानी पर कहानी में अगला मोड़ तब आया जब उस पापा और बच्चे के मिलने का था । जो कि काफी लंबा वक्त था ,पहले 40 दिन का इंतजार बच्चे का पासपोर्ट बनने का उसके बाद बच्चे के लिए वीजा अप्लाई किया गया । जो कि एक बार नहीं 10 से 15 बार रिजेक्ट हुआ । क्योंकि सिंगापुर एक छोटा सा देश है वहाँ बाहर से आने वाले पर्यटक खास तौर पर जो भारत से आ रहे है वह किसी भी प्रकार का खतरा मौल नहीं लेना चाहता था । जैसे-तैसे जुगाड़ लगा कर वीजा मिला । परन्तु सीधे भारत से सिंगापुर नहीं जा सकते थे । पहले दुबई वहाँ 2 दिन रुकने के बाद श्रीलंका, वहाँ 14 दिन क्वारंटाइन होने के बाद आखिर विराज और उसकी मम्मी सिंगापुर पहुँचे । पर मेरी नन्द में सिंगापुर जाने का ऐसा जुनून था कि अगर वीजा ना मिलता तो वह बजरंगी भाईजान जैसे मुवी की तरह भी तारों के नीचे से टापकर सिंगापुर अपने बच्चे को उसके पापा से मिलवाने ले जाती। उसका जुनून ही उसे सिंगापुर ले गया । 4 दिन के होम क्वारंटाइन के बाद हमारा प्यारा विराज 17 मार्च 2021 को अपने पापा से मिला । उस पल को सोच कर आज भी हमारी आँखे नम हो जाती है ।    - नरिंदर कौर 'बाबी',  ओल्ड राजेंद्र नगर, दिल्ली 

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