वफ़ा = झरना माथुर  

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रस्में-उल्फ़त तो निभानी पड़ेगी,
दिलों की लगी तो बढ़ानी पड़ेगी।

अकेले-अकेले चले जा रहे थे,
मगर अब रबानी दिखानी पड़ेगी।

गुलों की तरह जिंदगी हो हमारी,
मगर ये मुहब्बत छुपानी पड़ेगी।

गुजारी शबे-इन्तहां इश्क़ में जो,
वफ़ा चाँद को भी निभानी पड़ेगी।

बिना प्यार के यूँ न " झरना" बही है,
उमंग है भरी तो बहानी पड़ेगी।
= झरना माथुर, देहरादून
 

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