इंतज़ार = विनोद निराश 

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इंतज़ार मिलने का हो या बिछुड़ने का,
दर्द बहुत करता है,
मिलन हो या हो जुदाई 
व्याकुल बहुत करता है। 
एक उम्मीद होती है, 
तो एक नाउम्मीद होती है। 
उम्मीद बेचैन करती है, 
तो नाउम्मीद बड़ा तड़पाती है। 
उम्मीद की रात्रि के बाद,  
उगता है विश्वास का सूरज !
मगर नाउम्मीद के बाद ,
मन व्यथित होकर ऐसे हो जाता है ,
जैसे सूखे पत्ते, हरे-भरे पेड़ से विलग होकर,
उदासी का लबादा ओढ़कर,
हवा के रुख के साथ-साथ उड़ते चले जाते है,
दूर कहीं दूर अपने दरख्त की नज़र से,
जहां उन्हें कोई न देख सके। 
और आँख मूँद कर दरख्त के प्रति ,
अपने निश्छल प्रेम को,
याद करते-करते खो जाते है अतीत में। 
उम्मीद को नाउम्मीदी में बदलते कई बार देखा है , 
मगर नाउम्मीदी को उम्मीद में बदलते कभी नहीं देखा। 
यूं तो आश्वासनों के अम्बार चहूँ ओर ,
देखने को मिलते हैं ,
जल्द..बहुत जल्द छंट जाएंगे गम के बादल,
सुनने को मिलते है !
काश ! ये नाउम्मीदी का इंतज़ार ख़त्म हो जाए ,
और मेरे लिए उम्मीद का करिश्मा हो जाए। 
मेरी निराशा, आशा में बदल जाए,
निराश मन, फिर आशावान हो जाए।  
= विनोद निराश , देहरादून  (3 अप्रैल 2021 पूर्वाह्न)

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