जिंदगी भी क्या है ? = विनोद निराश

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जिंदगी भी क्या है ?
एक ख्वाब सरीखी,
शेष ज़िन्दगी का पड़ाव,
अशेष ख्वाहिशों की लालसा।  
मन अपने अंदर लिए वो अंतर्द्वंद 
जो कभी जीते जी,
पूरा न हो सके।   
कभी हार तो कभी जीत ,
यही है नियति ज़िंदगी की। 
ज़िंदगी के हर मोड़ पर ,
हर रोज़ एक नया फलसफा 
ज़िंदगी जीने का,
देता है एक नया अनुभव। 
कभी प्रश्नोत्तरी होती है खुद से ,
तो कभी होता खुद का इम्तिहान।
अवसादों से घिरा मन ,
रखता है हर पल आरज़ू जीतने की ,
करता है एक नामुकम्मल ज़द्दोज़हद
निराश दिल फिर से जीने की । 
= विनोद निराश , देहरादून (मंगलवार 15/06/2021)

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