कब छंटेगी भीड़ = शिप्रा सैनी

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कब तक रुकेगी बात,
यह बात जो चली।
कब तक ढलेगी रात,
जो लंबी हो चली। 

कब तक भरेंगे ये,
दो नैन लबालब।
बारिश थमेगी कब,
जो हठीली हो चली। 

कब तक छंटेगी भीड़,
इन हकीमखानों में।
वो बेटी नन्हीं सी,
यतीम हो चली । 

हवा में फड़फड़ा रहा,
अखबार का पन्ना।
खबर जाने की इतनी,
जिगर चीरती चली। 
= शिप्रा सैनी (मौर्या), जमशेदपुर
 

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