अर्चना तुम कहाँ हो ? - अर्चना पाण्डेय

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Utkarshexpress.com - मेरी सखी का नाम है अर्चना। कक्षा दूसरी में हम साथ ही पढ़ते थे। हम दोनों एक दूसरे के पूरक थे नाम में भी एक,  उम्र में भी एक,  और कद भी। उसका भी रंग गोरा और मेरा भी। हम दोनों में बहुत ही घनिष्ठता थी। वो जितनी प्यारी थी उतनी ही दिल की अच्छी भी। वैसे इंसान की वजह से ही दुनिया में खूबसूरती है। काश हर इंसान का दिल उतना ही साफ होता तो सबका ही भला होता। 
वह अपने नाना-नानी के साथ रहती थी। उसकी माँ तीन बहने थी, कोई भाई नहीं था। दो वृद्ध थे। जिनकी देख-रेख के लिए कोई नहीं था। तीनों बहने तीन जगह। गाँव का माहौल बहुत अलग था। वे दोनों वृद्ध। न ही कहीं  जा सकते थे न तीनों बेटियाँ अपना घर छोड़कर आ सकती थी। दिन पर दिन दोनों की उम्र बढ़ती जा रही थी। अर्चना उन दोनों की सहारा थी। नाना-नानी खूब प्यार देते थे। पर्व-त्यौहार के मौके पर अर्चना के माता -पिता आते थे। कुछ दिन रहकर 
वापस भी चले जाते थे। सबकी अपनी-अपनी गृहस्थी थी। सबके अपने-अपने काम थे। दो वृद्ध लोग और एक नन्हीं सी अर्चना। उम्र के इस पड़ाव में भी उनको बेटा न होने का गम था और हो भी क्यों न जब बुढ़ापे में कोई सहारा ही नहीं। 
हम दोनों सहेलियाँ  उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के चुरिया नामक गाँव में बालिका विद्यालय में पढ़ती थीं। विद्यालय केवल कक्षा आठ तक का था और पढ़ाने वाला सिर्फ एक शिक्षक। उनका नाम तो पता नहीं पर उनको हम सभी बाबू साहब के नाम से बुलाते थे। बाबू साहब चुरिया के बगल के गाँव नादौली से साईकल से आते थे। हम सभी की रोज पढ़ाई होनी मुमकिन नहीं थी क्योंकि बाबू साहब एक थे और आठ कक्षाएँ। उस समय कक्षा पाँच और कक्षा आठ के बोर्ड की परीक्षाएँ होती थी। इसलिए इन दो कक्षाओं पर वे विशेष ध्यान रखते थे। हम तो कई दिन ऐसे ही बैठकर आ जाते थे। पढ़ाई नहीं होती फिर भी विद्यालय जाना बहुत पसंद था क्योंकि हम खूब खेलते थे और मस्ती का तो पूछना ही नहीं। मेरी कुछ और भी सहेलियाँ थी जिनका नाम था बबिता, साबिता, रूबी और पिंकी । ये सारी सहेलियाँ चुरिया गाँव के ही थीं। मैं मानिकपुर से कुछ अन्य सहेलियों के साथ आती थी। मानिकपुर मेरा गाँव है और चुरिया मानिकपुर के पश्चिम में तकरीबन दो कि०मी० की दूरी पर है। हमारे मानिकपुर गाँव से विद्यालय दूर होने की वजह से हम कई सहेलियाँ मिलकर साथ ही जाती थीं। हमारा गाँव मानिकपुर और विद्यालय था चुरिया में। रास्ता बिलकुल सुनसान था। दिन में भी अकेले जाने से डर लगता था। इसलिए हम कई सहेलियाँ मिलकर ही विद्यालय जाती थीं। रंभा, मधेश, पुष्पा, रुक्मिणी हम सभी साथ जाती थीं। रास्ते में बहुत बड़ा तालाब आता है। बरसात के दिनों में पानी बहुत भर जाने की वजह से हम विद्यालय जाते और आते समय तरह-तरह की मछलियों और साँपों का दीदार करते थे। इन सारी परिस्थितियों ने मुझे बचपन से ही साहसी और निडर बना दिया। 
मेरे बचपन में बहुत सारे लोग मेरी ज़िंदगी में शामिल थे। फिर भी मेरी दोस्त अर्चना खास थी। उसी के लिए मैं रोज स्कूल जाती थी। मेरी ज़िंदगी में जो कुछ भी होता मैं उसे बताती थी। वो बड़े ध्यान से मेरी बातें सुनती थी। हम दोनों का बाल मन निश्छल था। उसको भी मुझसे बातें करना बहुत पसंद था। चूंकि विद्यालय में एक ही मास्टर जी थे इसलिए हमें खूब मस्ती करने का और खूब बात करने का समय मिलता था। हम सभी विद्यालय जाने में कभी अनाकानी नहीं करते थे। हमारा विद्यालय मस्ती की पाठशाला था।
अर्चना के आँगन में अमरूद के बहुत सारे पेड़ थे। वह हर रोज स्कूल में बहुत सारे अमरूद लाती थी। मैं कई बार अपने स्कूल के थैले में अमरूद भरकर अपने घर लेकर जाती थी। यह सिलसिला बहुत दिन तक चलता रहा। मैं अक्सर ही अमरूद घर लाने लगी थी। एक दिन जब बहुत सारे अमरूद घर लाई तो मेरी ईया ने हैरान होकर मुझसे प्रश्न किया - "रूबी, तुम्हारी सखी अर्चना तुमको ऐसे ही इतने सारे अमरूद देती है? इसके पैसे देने होंगे। 
ईया बोली कल तुम पूछकर आना। मैं बोली- ठीक है।
मैं भी सोचती रही -हमारे बीच तो कभी भी पैसे की बात हुई ही नहीं। अब रात को भी यही बात दिमाग में चलती रही। अब लग रहा था कि कब सुबह ही मैं स्कूल जाऊँ और ये बात साफ करूँ कि क्या उसने पैसे से अमरूद दिया है। मैं स्कूल गई। बड़ी उत्सुकता हो रही थी इस बात को पूछने की। मैं अपनी सखी अर्चना का हाथ पकड़कर पूछी, "क्या तुम हर रोज जो मुझे अमरूद देती हो उसके पैसे लोगी?
उसने झट से कह दिया- हम तो तुमको उधारे दिए हैं, वो क्या है न हमारे घर में बहुत सारे अमरूद के पेड़ है इसलिए हम तुमको अमरूद देते है। और वो भी उधारे। उस समय मैं नहीं जानती थी कि उधारे क्या होता है। बस वह बेफिक्र होकर कह दी और मैं सुन ली। अब जब मैं घर गई तो ईया ने पूछा, "रूबी तुम पूछ कर आई हो, क्या हमें पैसे देने है?"
मैंने झट से कह दिया, नहीं ईया हमारी सखी अर्चना बहुत अच्छी है।  उसने मुझसे कहा है कि वह उधारे मुझे अमरूद देती है। क्योंकि उसके घर में बहुत अमरूद हैं। 
ईया बोली - ठीक है, तब तो उसको पैसे देने पड़ेंगे। कल पूछकर आना कितने हुए? मैं बोली जब उधारे दिए है तो हम पैसे क्यों देंगे? ईया ने उधार किसे कहते है, इसको बहुत अच्छे से समझाया पर मेरे पल्ले कुछ नहीं पड़ा। मैं मन ही मन सोची, अगर अर्चना पैसे मांगेगी तो भी कोई परेशानी नहीं। मेरे पास तो भर गुलक पैसे हैं। वैसे भी गुलक भर गया है। उसको पैसे भी दे दूँगी और जो कुछ मुझे खरीदना है खरीद भी लूँगी। 
इस घटना के अगले दिन रविवार था। मन में बहुत सारे भाव थे। सारे प्रश्नों के उत्तर अर्चना के पास ही थे। सोमवार को जब मैं विद्यालय पहुँची और अर्चना से पूछी तुम तो मुझे उधार में अमरूद देती हो, तो मुझे तो तुमको पैसे देने होंगे।
अर्चना ने कहा - तुमको समझ नहीं आता, उधार का मतलब ऐसे ही। समझाते हुए आगे बोली- ऐसे ही का मतलब यह है कि मैं तुमसे पैसे नहीं लूँगी। तुम तो मेरी सखी हो और सखी को तो उधारे ही देते है, थोड़ी न पैसे लेकर। उस समय के लिए मैंने भी मान लिया कि उधारे मतलब ऐसे ही। पैसा नहीं लेना। जो कि गलत है। हम दोनों की दोस्ती की गाड़ी बहुत अच्छी चलती रही। हम दोनों एक दूसरे के साथ बहुत खुश थे। 
हमारे विद्यालय के मास्टर जी बाबू साहब ने गणित का नया पाठ शुरू किए। कौन भिन्न बड़ा है? हमारे कक्षा के अधिकतर विद्यार्थी गणित में अच्छे थे। हम बचपन में पहाड़े खूब याद करते थे। अधिकतर बच्चों को चालीस तक के पहाड़े आते थे। मुझे पच्चीस तक आते थे। कक्षा के अधिकतर विद्यार्थियों ने कौन भिन्न बड़ा है समझ लिया। 
बस तीन लोग बच गए। एक लखी नाम की हमारी लड़की और हम दोनों सहेलियाँ। फिर बाबू साहब ने अगले दिन कौन भिन्न पाठ पर टेस्ट रखा। सभी के उत्तर सही हुए। सभी ने बहुत अच्छे से समझ लिया था कौन भिन्न बड़ा है पाठ को। सिवाय हम तीनों के। लखी से तो बाबू साहब उम्मीद नहीं रखते थे क्योंकि वह कमजोर थी पढ़ाई में। पर हम दोनों को बुलाकर कान के पास दो-दो थप्पड़ जड़ दिए। हम दोनों सहेलियाँ रोईं तो नहीं पर हमारे कान लाल और गर्म हो गए। चोट भी काफी लगी । तब से लेकर अभी तक कौन भिन्न बड़ा है पाठ सुनकर डर जाती हूँ। वो दिन याद आ जाता है जिस दिन इसकी वजह से मुझे मार पड़ी थी।
गर्मी की छुट्टियों में अक्सर में अपनी नानी के घर चली जाया करती थी। इस बार भी गई। छुट्टी के बाद जब वापस लौटकर आई तो ....मैं अकेली रह गई थी। मेरी सहेली हमेशा के लिए जा चुकी थी। उसकी नानी की मृत्यु हो जाने की वजह से उसके रिश्तेदार नाना को भी लेकर चले गए थे। उसके बाद से मैं मेरी प्यारी सखी से कभी नहीं मिली। मैं असम चली आई। उसकी यादें हमेशा आ जाया करती हैं। सुकून मिलता है कि वो भी मुझे ऐसे ही याद करती होगी। फेसबुक में मैं अक्सर उसको ढूँढती हूँ। चेहरा बदल चुका है। अनेकों अर्चना है। ढूंढ पाना मुश्किल है। फिर भी उम्मीद पर दुनिया कायम है। मुझे उम्मीद है कि अर्चना से मेरी फिर से मुलाकात होगी, आज नहीं तो कल।
बचपन के दिन भी क्या दिन थे,
दिल भोले भाले कोरे कागज थे।
न उधो का लेना पता था हमें
न माधो का देना हम जानते थे।
यूँ ही और उधारे का फर्क भी
हम समझ नहीं पाते थे।
बचपन के दिन भी .............।
हम अपनी धुन में रहते थे,
अपनी ही रौं में चलते थे।
घर स्कूल किताब अमरूद
यही हमारी दुनिया खेल खिलौने थे।
हरदम हँसना खिल खिलाना यही
हमारे दिन काटने के बहाने थे।
बचपन के दिन भी ..............।
- अर्चना पाण्डेय (अर्चि), तिनसुकिया, असम

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