परेशान क्यूँ है = किरण मिश्रा

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आज हर सख्स , उलझा हुआ परेशान क्यूँ है। 
कल जहाँ मेले थे, आज फैला वीरान क्यूँ है। 

अपनी बोयी हुई ही, इंसानो की ये फसलें हैं। 
चीख रहें हैं देश, तरक्की हुई मशान क्यूँ है।

प्रकृति को नष्ट किया,बार बार चेताने पर भी, 
सोचो जानमाल का, इतना नुकसान क्यूँ है।

जिन्दा आदमी ,बन्द हुआ आज पिंजरे में,
परिन्दा भी देख, ये हालात परेशान क्यूँ  है।

धड़कने थम रहीं, विश्व की वेन्टीलेटर पर,
जिन्दगी लीलता, वायरस हुआ शैतान क्यूँ है।

बेकार हुई सुविधाएं, विज्ञान की तरक्की की,
हर सख्स लाचार, सड़के हुई शमशान क्यूँ हैं। 

गुम हुए अल्लाह, मन्दिरों में कैद अब ईश्वर ,
हाथ धुलना, सख्स-डिस्टेंसिंग हुई अजान क्यूँ है।
= किरण मिश्रा "स्वयंसिद्धा", नोएडा
 

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