दिव्य रूप दिखलाऊँगी = अनिरुद्ध कुमार

दिव्य रूप दिखलाऊँगी = अनिरुद्ध कुमार

बाबुल मुझे प्रेम बंधन से, 
गैर समझ ठुकराया क्यों?
तोड़ना हीं था जब घरोंदा, 
मुझको गले लगाया क्यों?

मुझे बोलके गुड़िया चिड़ियां,
जीवन गीत सुनाया क्यों?
तोता, मैना, बोल बोल के, 
स्नेह सुधा बरसाया क्यों?

डरी रात को,जब जग जाती, 
चादर तान सुलाया क्यों?
मैं क्या जानूं खेल जगत का,
मुझको स्वप्न दिखाया क्यों?

बचपन, यौवन, चढ़ी जवानी, 
नाना रूप सजाया क्यों?
दो रोटी में हीं मैं खुश थी, 
सुख दुख पाठ पढ़ाया क्यों?

कांधा जो अवलंब हमारा, 
वह आकाश हटाया क्यों?
चूड़ी , कंगन, बाबुल, पीहर,
अलंकार उलझाया क्यों।?

बिखर गये जीवन के सपने, 
तिल तिल कर तड़पाया क्यों?
तोड़ के विश्वास की डोरी, 
तन मन अगन लगाया क्यों?

निर्बोध को अबला जान के, 
गजब मोड़ पे लाया क्यों?
व्यथित हो गई छाती मेरी, 
स्नेह अश्रू नहलाया क्यों?

और क्या बोलूँ बचा हीं क्या?
दूजे संग पठाया क्यों?
हार गई यह सोंच सोंच के,
दिल का दर्द बढ़ाया क्यों?

हे समाज के ठेकेदारों,
भेदभाव फैलाया क्यों?
उलझ गई मैं जंजालों में,
कह अबला मुस्काया क्यों?

हे परमेश्वर हमें बता अब, 
मुझे नारी बनाया क्यों?
दो कुल की जिम्मेवारी दे,
बलि हमारा चढ़ाया क्यों?

हारी नहीं अभी दमखम है,
कुछ बनकर हीं जाऊंगी।
नारी नारायणी स्वरूपा,
दिव्य रूप दिखलाऊँगी।
= अनिरुद्ध कुमार सिंह,
   धनबाद, झारखंड
 

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