यादों की खिड़की = झरना माथुर 

यादों की खिड़की = झरना माथुर

मैने जब अपनी यादों की खिड़की खोली,
खुद को अपने बचपन की गोद मे पाया।

जिन्दगी के सुनहरे वक़्त को फिर से जिया,
खुद को स्कूल, खेल- खिलोने के बीच पाया।

माँ की ममता, पिता का प्यार महसूस किया,
तो खुद को उसकी आँचल  की छाँव मे पाया।

वो बहती हवा की ठंडक,बारिश का मौसम,
वो बेफिक्र भीगने के आनन्द को पाया।

वक़्त रुकता नहीं कभी बढ़ता  ही जाता है,
और मैने एक दिन खुद को ससुराल में पाया।

हुक उठती दिल मे पीहर याद आता है,
सब छोड़-छाड़ के खुद को उनके बीच पाया।

मायके की बगिया को सीचते भाई - भाभी,
मैने अपने को आनंदित प्रफुल्लित पाया।

यूँ ही रहे आबाद सदा मेरा मायका,
जहाँ मैने प्यार और सम्मान को पाया।

जब बेमन से यह यादों की खिडक़ी बंद की,
तब खुद को अपने पति और बच्चों मे पाया।
= झरना माथुर, देहरादून
 

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