नारी = पूनम शर्मा

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पढ़ सको तो पढ़ो मुझे ,
सृष्टि का इक सार हूंँ मैं।
दबी कुचली कई अरमानों का,
एक छोटा सा संसार हूंँ मैं ।
देख सूरत सभी हर्षाते ,
दिल का दर्द समझ नहीं पाते।
पाया जीवन सब ने मुझसे,
फिर क्यों कैद में हम जीवन बिताते।
चूड़ी ,बिंदी ,सिंदूर , मांँगटीका,
क्यों हमारी पहचान बनाते ।
ख्वाब हमारे भी बहुत हैं,
आसमान को छूना चाहते।
बंध बंधन में फिर भी हम ,
जाने क्यों जीवन जीते जाते।
दर्द हो भीतर चाहें जितना,
फिर भी हम हैं बस मुस्काते।
अंधेरे के दीपक जैसे,
ता उम्र बस जलते जाते।
©️पूनम शर्मा स्नेहिल, गोरखपुर, उत्तर प्रदेश 

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