महिला काव्य मंच की गोष्ठी का आयोजन 

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utkarshexpress.com दिल्ली- महिला काव्य मंच मध्य दिल्ली इकाई की सफल गोष्ठी का आयोजन श्रीकृष्ण जन्मोत्सव के अवसर पर धूमधाम से किया गया। जिसकी अध्यक्षता आदरणीया श्रीमती डाॅ.भूपिंदर कौर जी ने की। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर  सभी  सदस्य श्रीकृष्ण के प्रेम भक्ति के रंग में रंगे हुए थे। कार्यक्रम का सुंदर एवम सरस् संचालन श्रीमती स्नेहलता पाण्डेय "स्नेह" जी ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ " श्रीमती कुसुम जी "ने भावपूर्ण एवम मधुर सरस्वती वंदना से किया। श्रीमती इंदु मिश्रा किरण जी ने अपनी सुंदर रचना पढ़ी  -
नदी के किनारे की हर धार पढ़ना,
लिखा लहर पे उसको हर बार पढ़ना।
श्रीमती श्यामा भारद्वाज जी ने कृष्ण जन्म पर "मथुरा में जन्मे कन्हाई,सारे ब्रज में खुशियां छायी "।
श्रीमती कुसुमलता कुसुम जी ने रुक्मिणी के दर्द को व्यक्त करता हुआ एक भाव प्रणय  गीत पढ़ा।
"न राधा न मीरा न बंसी न गीता,
सदा रुक्मिणी मैं उपेक्षित रही।
मेरा दोष क्या है बताओ हे कान्हा,
नहीं क्यों मैं राधा सी पूजित रही।"
श्रीमती पुष्पिंदर चगती भंडारी जी ने रुक्मिणी पर एक मुक्तछंद पढ़ा।
"रुकमणी हूं मैं, प्रथम पत्नी त्रिभुवन पति, नटवर कृष्ण की।"  इस प्रस्तुति ने वातावरण में  समां बांध दिया।
दक्षिणी दिल्ली इकाई की वरिष्ठ उपाध्यक्ष डा.अंजु लता सिंह 'प्रियम' ने अपनी गीतात्मक  रचना "गरबा गजब हुआ रे" पढ़कर सबका मन मोह लिया।
*हाथों में सजती-
कान्हा की बंसी,
ग्वालों के बीच में -
नाचे यदुवंशी...
मिलने का सबब हुआ रे..
गरबा गजब हुआ रे.
पश्चिमी दिल्ली की सचिव वीणा मिश्रा जी  ने जीवन की सकारात्मकता से भरी हुई जिंदगी खेल नही है यार, कविता पढ़ी और सभी को जीवन की विषमताओं से रूबरू कराया।
चंचल हरेंद्र वशिष्ठ जी ने अपनी रचना पढ़ते हुए कहा - 
"हे कृष्ण कहो कब आओगे!
संकट में आज है ये धरती।"
प्रीति त्रिपाठी जी ने राधा कृष्ण के प्रेम पर सुंदर मनहरण घनाक्षरी और नारी शक्ति पर रचना पढ़ी। 
"ये सफर बहुत है कठिन मगर मुझे मंजिलों की तलाश है।" 
सरिता गुप्ता जी ने भी नारी शक्ति पर सुंदर ग़ज़ल पढ़ी।
"मुझे मालूम है यह जिंदगी गुलशन नहीं होती
 यहां पर कौन है ऐसा जिसे उलझन नहीं होती।"
 अर्चना वर्मा जी ने पढ़ा -
 "जिंदगी तेरी किताब का हर पन्ना नया सा लगा।"
 संचालिका स्नेहलता पांडे जी कहा - न  शिकवा जिंदगी से,शीर्षक की बेहद अर्थपूर्ण रचना पढ़ी।
"जिंदगी क्यूँ मुश्किल ,तेरी राह इतनी है।
दिखती है मंज़िल पास, पर दूर कितनी है।"
कार्यक्रम का समापन करते हुए कार्यक्रम की अध्यक्षा डॉ. भूपिंदर कौर जी ने सभी की रचनाओं की सुंदर समीक्षा और उत्साहवर्धन भी किया।
उन्होंने नारी विमर्श पर मुक्त छंद में  बहुत अच्छी रचना पढ़ी।
खुद को घर की, जिम्मेदारियों में झोंक दिया, 
पता ही नहीं चला, कब गोदी का बच्चा,  घोड़ी पर चढ़ बैठा।
और खुद को निहारती आईने में, क्या से क्या हो गया।"
सभी के सहयोग और भावपूर्ण प्रस्तुतियों से  वातावरण प्रफुल्लित हो गया, समय का भान नहीं रहा। और कार्यक्रम का समापन किया। एक बहुत ही शानदार एवं  काव्यगोष्ठी सम्पन्न हुई।

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