दुनिया - जया भराडे बड़ोदकर 

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सिरहाने बैठी रहती हैं,
कभी मुस्कुराती है,
कभी ये रुलाती भी है,
सारे जहाँ मे एक यही तो ,
मेरे दिल में रहती है। 
काटों मे चलाकर दुनिया,
बड़ा सबक सिखाती है,
कभी फूलो की तरह खुशबू ,
बिखेर देती है। 
वहम तो ये दुनिया गजब,
का फैलाती है। 
दूर से ये बिल्कुल मृग मरीचिका सी ही दिखती है,
असली चेहरा तो वक्त आने पर ही बताती है,
बड़ी आग है ये कभी भावनाओ को झुलसाती है,
और कभी शीतल चाँद सी,
ये छा जाती है। 
इंद्र धनुष के सात रंगो में ,
कभी ये बहुत भाती है,
हर एक पल में रोज-रोज,
नये-नये ढंग से लुभाती है,
नन्ही-नन्ही भोली-भाली बन के ,
मन में बड़ी सुहाती है। 
कभी बूढी सी बन के,
बाते बहुत सुनाती है,
चारो ओर की खबरे दिखाकर,
मन को बहुत ललचाती है,
तन-मन सब हारा इससे,
ये अनचाही मौत भी लाती है। 
कभी दर्द का फाहा होती है,
अंत में मौत से किनारा कर लेती है,
मत बहको इस झूठी दुनिया मे,
यही सच्चाई मेरी समझ में आती है,
दूर-दूर ही रहना इसके,
ये वक्त-बेवक्त सबक बड़ा सिखाती है। 
जया भराडे बडोदकर, नवी मुंबई (महाराष्ट्र)

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