ये कैसा वनवास रे (गीत) = किरण मिश्रा 

ये कैसा वनवास रे (गीत) = किरण मिश्रा

आलिंगन के प्रहर में प्रिय! ये कैसा वनवास रे। 
ऋतु बासन्ती गा रही जब, प्रणय का मधुमास रे।।

रात्रि खिली थी इक कली, 
यादों से तेरी कोख भर,
भोर तक रिसती रही जो,
शबनम सी मोती पोंछ कर।

उर निलय में प्रीत तेरी,
भर रही उन्माद रे। 
बिन तुम्हारे कृश नयन,
पतझड़ के जैसे पात रे ।
आलिंगन के प्रहर में प्रिय! ये कैसा वनवास रे। 
ऋतु बासन्ती गा रही जब, प्रणय का मधुमास रे।

फागुनी मादक हवायें,
प्रकृति का ऋंगार कर दी,
टेसू कहीं, पलाश कहीं,
नव कुसुम कलियों, 
संग अभिसार कर ली। 

संदली मादक मलय, 
खिला रहा जलजात रे। 
कामिनी,कोमल कमलिनी,
जोहती तेरी बाट रे।
आलिंगन के प्रहर में प्रिय! ये कैसा वनवास रे। 
ऋतु बासन्ती गा रही जब, प्रणय का मधुमास रे।

अल्हड़ तितलियों के पंख रंग,
फागुन रंगोत्सव मना रहा,
भ्रमर पी पराग छककर,
नशे में डगमगा रहा।

ले सुभग ! बाँहों में लतिका,
प्रणयिनी आह्वान रे। 
अमलतास मस्ती में झूमे,
रुनझुन रुनझुन गान रे।
आलिंगन के प्रहर में प्रिय! ये कैसा वनवास रे। 
ऋतु बासन्ती गा रही जब, प्रणय का मधुमास रे।
= किरण मिश्रा  "स्वयंसिद्धा" नोएडा
 

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