तुम्हारी यादें - विनोद निराश

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पूनम की रात में ,
तुम्हारी यादें ,
मेरी ख्वाहिशे, 
स्नेहिल से स्वप्न,
व्याकुल कर देते है,
उर अन्तस को।  

दूर क्षितिज तक ,
देखते - देखते ,
अनवरत तुम्हे ,
सोचते - सोचते ,
खो जाता हूँ 
इन्द्रधनुषी ख़्वाबों में। 

कभी तुम अनुरागित हो,
प्रेम बरसाती हो ,
तो कभी मासूम बेरुखी से ,
पीड़ा पहुंचाती हो।  
ये देख इंद्रधनुषी स्वप्नो से, 
उठ जाता है, ऐतबार सा। 

अगले क्षण पुनः मुड़,
दिल की उदास नगरी में 
आस की ज्योति जला देती हो , 
पनीले नयनो को ,
निराश पथ पर जाने से,
मुस्कुरा कर रोक लेती हो। 
- विनोद निराश , देहरादून 
 

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