अक्षर ढाई प्रेम का - प्रियदर्शिनी पुष्पा

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अक्षर ढाई प्रेम का , परिणय बंधन आस।
मरुथल सा सूखा हृदय, आज लगे मधुमास।।
आज लगे मधुमास, संग है जीवन भर का ।
सप्तपदी-व्रत ठान,अद्यतन राह सफर का।।
कहे पुष्प है प्रीत, नहीं वर्णों का प्रक्षर।
है अनंत अक्षुण्य, प्रेम का ढाई अक्षर।।
ढाई अक्षर प्रेम का , पढ़ लो मेरे लाल।
दुखियों की सेवा करो, करलो उत्तम भाल।।
करलो उत्तम भाल , अपरिमित आदर मन में।
सखा प्रेम स्वीकार, सुदामा सम जीवन में ।।
है विभोर ये पुष्प, डूबकर भाव मिताई।
खाकर तण्डुल अन्न,निभाते अक्षर ढाई।।
ढाई अक्षर प्रेम का , मत करिए अपमान।
नेह दिखाकर लूटते , नारी का सम्मान।
नारी का सम्मान, तोड़कर कलुषित करते।
मन से विकृत लोग, ताड़ना दे खुश होते।
कहे पुष्प ये बात, मिटाओ मन की काई।
पढ़ लो दिल से आज, प्रेम का अक्षर ढाई।।
- प्रियदर्शिनी  पुष्पा, धनबाद

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