देखता मन मार के - अनिरुद्ध कुमार 

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क्या जियें कह जिंदगी प्यार में सब हार के ,
रूठ बैठी हर खुशी, क्या कहें चितकार के।

शूल बनकर भावना नित कलेजा चीरती,
नाज नखड़ा है कहाँ दिन गये गुलजार के।

अब बहारें क्या कहें पूछने वाला नहीं, 
बह रही ठंडी हवा दिल हमेशा जार के।

आसियाना लुट गया बेसहारा हो गये,
दरबदर होके चलें क्या कहे ललकार के।

रौशनी दिखती नहीं उलझनों से वासता,
धूंधली चादर लगे ख्याल में दिन प्यार के।

देखते बैठे सदा हर तरफ तनहाइयाँ,
बोलता कोई नहीं आज हैं बेकार के। 

'अनि' भरोसा क्या करे, ये कयामत की घड़ी,
नित तड़पते हो सुबह, देखता मन मार के।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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