मेरी कलम से - अनुराधा पाण्डेय 

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देह का सम्बंध मृण्मय
आत्मा अवदान ले लो ।
चितवनों की भीड़ में मैं,
पा गयी हूँ,पावनी छवि ।
चित्त निर्मल हो सका है,
डाल कर निज प्राण का हवि ।
ध्येय यदि केवल समर्पण....
प्रेम का फिर दान ले लो ।
देह का सम्बन्ध मृण्मय
आत्मा अवदान ले लो......
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कुंतलों की घटा से कहो कब भला ,
चंद्र चितवन तुम्हारी ढ़केगी  प्रिये !
ओस की अनछुई बूँद सी लग रही ,
रूक्ष मसि क्या तुम्हें छू सकेगी प्रिये ?
बिन लिखे ही प्रकट-सी महाकाव्य तुम,
शेष है क्या बचा जो लिखे व्यंजना....
व्यक्त को क्या करेगी समसि व्यक्त फिर,
कोटि वर्षों लिखेगी थकेगी प्रिये !
- अनुराधा पाण्डेय , द्वारिका , दिल्ली

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