मेरी कलम से - अनुराधा पाण्डेय

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बिखरे उसके भाल पर अल घुँघरावलि केश।
मस्त मलङ्गा वो सखी! धरे फकीरी वेश।

भाल तिलक श्रमबिन्दु शुभ,कुंचित कारे केश।
चारु चिबुक शुक नासिका, अहो! जोगिया वेश।।

सुकृति पुंज गरमाल है, केसरिया परिधान।
नील सरोरुह नैन दो,निसरत मन्मथ बान।।

प्रेम प्रीति ऐसे लिए, जोगी आया ठौर।
आम्र वृक्ष महका चले, जैसे कोई बौर

कबिरा सा फक्कड़पना, क्या मलङ्ग क्या पीर।
छाप तिलक धारे हुए, आया एक फकीर।।

अंगहि धारे गेरुआ,और त्रिपुण्डी भाल।
केसर मौली कर बँधा,वक्ष रुद्र की माल।।
भस्म रमाए गात पर, आया जोगी द्वार।
माई!जोगन मैं हुई,गयी सहज सब हार।।

प्रणय की रीति ही उल्टी ,प्रणय का है गणित अद्भुत
जहाँ सब हारना सुखकर , तदपि हम जीतकर रोये।

चंदन तन चंचल नयन , अधरों का विन्यास ।
कितना कुसुमित है प्रिये ! यौवन का मधुमास ।।

दीर्घ रात्रि क्षण में कटी,सुखप्रद हुआ प्रभात।
ग्रन्थिबन्ध श्लथ बाँह से,निकला कोमल गात।।

शुभ मुहूर्त शुभ लग्न अरु, गुलिक मङ्गलायोग।
जोग भोग युग्मित हुए, मणिकांचन संयोग।।
- अनुराधा पाण्डेय द्वारिका , दिल्ली 
 

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