तुम्हारा प्यार लिखा - अनुराधा पाण्डेय 

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सखे ! तुम्हारा प्यार लिखा...
नाम तुम्हारा लिख-लिख मैंने
हर चिंदी पर छोड़ दिया ।
नित्य बनाया एक घरौंदा,
किन्तु लहर ने तोड़ दिया ।
जितनी बार मिटाए जग ने ,
मैंने उतनी बार लिखा ।
सखे ! तुम्हारा प्यार लिखा।

मैंने अपने मन मंदिर में 
पारिजात अवधान लिए। 
रही पूजती एकनिष्ठ मैं,
निज मन का भगवान लिए ।
रहा देवता मौन सतत पर....
मैंने तो मनुहार लिखा ।
सखे ! तुम्हारा प्यार लिखा।

चुनने को जब चली सुमन तो ,
शूलों ने सत्कार किया ।
रही सोचती किन भूलों ने ,
मुझको यह अधिभार दिया ।
घावों को सहलाया मैंने,
पीड़ा का श्रृंगार लिखा ।
सखे ! तुम्हारा प्यार लिखा ।
- अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली  

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