तय करूँ मग्न हो प्रीत में दूरियां - अनुराधा पाण्डेय 

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दो सुगढ़ पाँव पर पाँव धरकर सजन!
तय करूँ मग्न हो प्रीत में दूरियां ।
बांह की माल कटि में सतत डाल कर,
जी करे है चलो चाँद के गाँव तक ।
मैं चलूँ तो वहाँ,पर तुम्हीं ले चलो ,
पाँव रक्खूं तुम्हारे महज पाँव तक ।
पंथ में मैं तुम्हें,तुम मुझे देखना ,
हम रखेंगे हृदय की खुली खिड़कियां ।
तय करूं मग्न हो---
हर कदम पर नरम साँस छूती रहे ।
नैन में प्रेम के स्वप्न पलते रहें ।
सेज संयोग तक हम करें कल्पना,
तन तपें ,रूक्ष पाषाण गलते रहें ।
जब मिलन योग अभिसार के क्षण लभे ।
तो सुमन गंध हो बज उठे चूड़ियाँ ।
तय करूँ मग्न हो---
मात्र साक्षी बने सब दिशाकाश ही,
इस तरह के सरस प्रेम श्रृंगार में ।
एक मैं ,एक तुम बस रहें उस जगह,
और कोई न हो पूर्ण संसार में ।
फिर तरल बन परस्पर घुलें इस तरह,
मध्य से मिट चले लाज की भित्तियां ।
दो सुगढ़ पाँव पर पाँव धरकर सजन !
तय करूँ मग्न हो प्रीत में दूरियां ।
- अनुराधा पाण्डेय, द्वारिका, दिल्ली 

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