धर्म चिंतन दिव्यानंदम -  टी. एस. शान्ति

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utkarshexpress.com - ज्ञानियों ने फरमाया है कि हे मानव तू अपनी संपत्ति को पहचान। राग, द्वेष तथा अहंकार के जाल से मुक्त जो होता है, वही सच्चे आत्मिक सुख की प्राप्ति कर सकता है, ऐसे साधक व्यक्ति का सुख चक्रवर्ती राजा के सुख से भी बढकर होता है। आखिर तो आत्मलीनता की दशा का जो सुख है उसका अंश मात्र सुख भी भौतिक पदार्थों में नहीं मिल सकता।
जिन्हें राजनीति के बारे में कोई ज्ञान नहीं, ऐसे लोग भी राजकार्य की समीक्षा करने बैठ जाते हैं। धर्म चिंतन में दिव्य आनंद भरा पडा है, इससे आत्म प्रकाश बाहर आता है, यह ऐसा अमूल्य तत्त्व है, जिसके पठन, मनन, चिंतन से कभी थक नहीं जाते। हर एक को अलग-अलग रीति रिवाजों की चर्चा करके भी इन्सान अपना मन लगाने की कोशिश करता है, इन सारी चर्चाओं के माध्यम से चिंताओं को भूलने का प्रयत्न करता है।
चंदन को जैसे घिसते हैं तो अधिक सुगन्ध देता है, वैसे ही जीव जब-जब आत्मतत्व,धर्मतत्व में लीन होता है, जीवन सौरभ महक उठता है, क्योंकि आत्मा की बात स्वरस की बात है। क्योंकि यह सब जीवन के उत्कर्ष में सहायक बन सकता है। मानव स्वयं को भूल गया है, उसे स्वआत्मा की पहचान करने के लिए धर्म कथा की आवश्यकता है। इसलिए भगवान ने कहा है तू अपनी आत्मा को समझ, तभी विश्व और परमात्मा को समझ सकेगा।
"कर्त्तृत्वं नान्यमावनाम् साक्षित्वं अवशिष्यते।"
आत्मा वास्ता का कर्ता नहीं, पर दृष्टा, साक्षीरुप है, यदि यह बात समझ में आ जाए, तो हम धर्म कथा के श्रवन, चिंतन से धर्म रास्ते पर समझदारी पूर्वक चल सकते हैं।
-  टी. एस. शान्ति,मदुरै तमिलनाडु, संपर्क - ९४८६२०७८१९

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