दोहा- (मित्रता)- अनिरुद्ध कुमार

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जग जाहिर है मित्रता, कृष्ण सुदामा जान।
धरती पर जीवंत यह, लोग करें गुनगान।।

बहुत जरूरी मित्रता, हर मुखपे यह गान।
होठों पर रटना लगा, सदा मित्र का मान।।

मित्र बिना जीना दुलम, मित्र एक पहचान।
अमर प्रेम की यह लड़ी, होठों पर मुस्कान।।

सुखदुख का अवलंब यह, जीना हो आसान।
मित्र सदा मन मोहले, दिल देता सम्मान।।

जीना मरना साथ में, मित्रता पर गुमान।
यारों का मन जीतले,  हो जाता कुर्बान।।

मित्र सदा दिल में बसे, मित्र लगे वरदान।
सुखदाई है मित्रता, गर्वित आज जहान।।

मित्रता का अभिनंदन, चंदन, वंदन मान।
मित्र लगे संजीवनी, सदा रहे अभिमान।।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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