दोहा - अनिरुद्ध कुमार 

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प्रेम सदा मन मोहले, हर होठों पर हर्ष।
आनंदित तनमन लगे, जीवन हो उत्कर्ष।१।

मन हुलसित उल्लास से, रोम रोम उन्माद ।
मानव तन चंदन लगे, विचरे मन आजाद।२।

हर्षित चित नभ में उड़े, आलौकित आकाश।
इधर उधर नयना पड़े, सुंदर दिखे प्रकाश।३।

रागरंग उल्लास में , चित में उठे तरंग।
राही को नव राह दे,  पग-पग जगे उमंग।४।

आकर्षण इस हर्ष में, तनमन जागे चाह।
हुलसित मन उल्लास से, बुद्धि विवेक अथाह।५।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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