दोहा सृजन - मधु शुक्ला 

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दानी  धरती   सा  नहीं, जग  में   कोई  और।
लेकिन मानव ने किया, कभी न इस पर गौर।।

खनन करें हद से अधिक, लाभ हेतु सब लोग।
कल की बात न सोचते, लगा स्वार्थ का रोग।।

कंपित  होती  जब  धरा,  होता  है  नुकसान।
फिर भी मनुज न चेतना, ढूँढ़े नित नव खान।।

ओढ़ अवनि गम्भीरता, करती है उपकार।
हम भी उसको मान दें, व्यक्त करें आभार।।
 – मधु शुक्ला , सतना, मध्यप्रदेश .
 

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