ज्ञान का झंडा - अनिरुद्ध कुमार

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रास्ता अंजान राही, खो नहीं जाना।
ढ़ूढ़ना है राह कोई, दूर है जाना।।
सामने बाधा अनेकों, राह वीराना।
क्या भरोसा जिंदगी का,सोंच दीवाना।।

कौन जाने क्या लिखा है, भावना पाले।
जिंदगी को शानसे जी, प्यार से गाले।।
तोड़ देना मोह माया, लोभ का घेरा।
देख होने को सवेरा, सोंच क्या तेरा।।

आदमी तो है परिंदा, भाव का फेरा।
रोज पाये रोज खायें, साधु या चेरा।।
ज्ञान की बातें बघारे, कौन है तेरा।
ये विधाता की जमीं है, बोलता मेरा।।

जागजा, चेतो अभी से, राग क्या छेड़ा।
दूर की सोंचो हमेशा, तोड़ के बेड़ा।।
पार जाना है सभी को, व्यर्थ है सारा।
बैठके क्या सोंचते हो, बोल क्या हारा।।

जिंदगी सौगात मानो, ज्ञान हीं गंगा।
ज्ञान के लाखों पुजारी, ज्ञान से चंगा।।
ज्ञान हीं पूँजी यहाँ की, ज्ञान ही डंडा।
देखले ऊँचा सदा है, ज्ञान का झंडा।।
- अनिरुद्ध कुमार सिंह, धनबाद, झारखंड
 

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