खुद को तन्हा पाया - विनोद निराश

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यूँ ही परत- दर-परत,
लिपटी रही ख्वाहिशें मेरी ,
मैंने जब भी खुद को,
तुम्हारे पास देखने की कोशिश की ,
मगर खुद को तन्हा ही पाया मैंने। 

जब भी कभी खुद के भीतर, 
झाँकता हूँ अपने एकाकीपन को ,
हो जाता हूँ मायूस सा मैं,
ये सोच कि तुम कभी तो मिलोगे,
मगर खुद को तन्हा ही पाया मैंने। 

कभी रोता हूँ मैं, कभी हँसता हूँ मैं ,
खुद से रोज़ लड़ता हूँ मैं ,
बस आज ज़िंदा हूँ मैं यही सोच के,
तुम संभाल लोगे मुझे एक दिन ,
मगर खुद को तन्हा ही पाया मैंने। 

जब तुमने ज़िद्दी लहज़े में कहा था मुझे 
मुझे गुलाबी रंग बहुत पसंद है,
कमरे की उन गुलाबी दीवारों को,
आज भी निहारता हूँ मैं,
मगर खुद को तन्हा ही पाया मैंने। 

वक़्त क्या बदला ज़माना बदल गया ,
वक़्त के साथ दिल निराश हो गया ,
कभी तुम्हारी बच्चे सी ममता, 
कभी ये बे-मौसमी इश्क़ की बरसात, 
मगर खुद को तन्हा ही पाया मैंने। 
- विनोद निराश, देहरादून 
 

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